Thursday, October 29, 2015

स्वयं

गौर से सुनो
मुसीबतों की चट्टानें कहती हैं
हम कमजोर नहीं

लेकिन
तुम्हारी कोशिशों का पसीना
गला देता है हमें
और तुम
उस पसीने से धुलकर
निखरते हो
जैसे कोई नया पैदा हुआ बच्चा

हर कोशिश जन्म देती है
नया "स्वयं"

गौर से सुनो
मुसीबतों की चट्टानें जो कहती हैं

7 comments:

  1. ऊर्जा का एक स्रोत जो आपकी रचनाओं से प्राप्त होता है, बादस्तूर जारी है.. ढेरों शुभकामनायें।

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  2. 'हमें' से आपने किसे सम्बोधित किया है (पहला पैरा, तीसरी लाइन; और दूसरा पैरा, तीसरी लाइन)? कविता का ख्याल बहुत अच्छा है। कुछ ऐसे, जैसे कहीं एकांत में स्वयं को पुनर्जीवित करने की कोशिश।

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  3. प्रशंसनीय, शुभकामनाएं

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  4. धन्यवाद राहुल जी, प्रद्युम्न्य त्यागी जी

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  5. यहां हमें जीवन की मुश्किलों को कहा है

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  6. बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने....

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  7. शुक्रिया गुप्ताजी

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