हमने सफेद पर्दे गिरा रखे हैं
भीतर की काली खिङकियों पर
हकीकत अपनी बता
शर्मिन्दा नहीं होना चाहते हम ।
भीतर की काली खिङकियों पर
हकीकत अपनी बता
शर्मिन्दा नहीं होना चाहते हम ।
कन्चों में
माचिस की खाली डिब्बियों मे
पन्चर हुये टायर में
टूटी चूङियों में
गुड्डे गुङियों में
रखा छोङा है
ं
चलो
पुराने काठ के बक्से से वो
बचपन निकाले ...
छोटे हो चुके स्वेटर
सन्तरे की गोलियां
लुका छिपी
पकङा पकङी
गांव की गर्मी वाली छुट्टियां
ं
बनाये थे जो घरौन्दे
फिर रेत हुये थे जो
आ मिट्टी से उन्हे वापिस लिवा लें ...
फिर से बचपन निकालें ...
वो वक्त भी खुद से हारा था
उस दिन बंटवारा था ...
जलती आग का उठता हुआ धुंआ था
राम की खाला, रहीम की माँ का कत्ल हुआ था...
सरसों के खेतों में लाशों की फसल उगी थी
ईमान की गर्दन हैवान के आगे झुकी थी ...
बांट डाले घर-बार
गम-त्यौहार
बन्द कर डाले वो द्वार,
जिनपर आने जाने की कहानियां लिखी हुई थी ...
तो फिर
सांसे लेना बँद क्यूं न किया मजहब बांटने वालों ने
हवा तो हिन्दु-मुसलमान ना हुई थी ।