Monday, May 12, 2014

काला -सफ़ेद

हमने सफेद पर्दे गिरा रखे हैं
 भीतर की काली खिङकियों पर
 हकीकत अपनी बता
शर्मिन्दा नहीं होना चाहते हम ।

तिलिस्म

अजब
तिलिस्म बिखरा पङा है
 मैं
 जिन्दगी
 समेटती हूँ
और हाथ छोटे होते जाते हैं
 मैं हैरान हूँ
 सिकुङ रही हूं
 हर पल
रिस रही है मौत मुझसे

विनाशक

पत्थर बोये थे
 अब
 दीवारें उगने लगी हैं यहां
और
 फैलती जा रही हैं जहरीली हवा होकर
 अब दम घुटता है
 सांसे डूबती हैं
अपने विनाशक
 हम ही हैं

कशमकश

भीतर को
दो खम्भे गङे हैं
 सही गलत के
कशमकश के तारों से बन्धे हैं
दोनों
 और
 छटपटा रहे है
 लहुलुहान हैं
 बीच में अटके पङे हैं
 उलझे हुए है
हम

Wednesday, May 7, 2014

बचपन

कन्चों में
माचिस की खाली डिब्बियों मे
पन्चर हुये टायर में
टूटी चूङियों में
गुड्डे गुङियों में
रखा छोङा है

चलो
पुराने काठ के बक्से से वो
बचपन निकाले ...

छोटे हो चुके स्वेटर
सन्तरे की गोलियां
लुका छिपी
पकङा पकङी
गांव की गर्मी वाली छुट्टियां


बनाये थे जो घरौन्दे
फिर रेत हुये थे जो
आ मिट्टी से उन्हे वापिस लिवा लें ...

फिर से बचपन निकालें ...

Sunday, April 27, 2014

अहिल्या

स्वर्ण मुद्राओं के बादल
बरसते है आजकल
और ज़मीन पर
बोते  हैं
घृणा , द्वेष ,कटुता .....
 स्वार्थ के वृक्षों से
अटी पड़ी है पृथ्वी
जंगल हुई जा रही है ....
हम क्रोध के फल खा रहे है
और मृत्यु को उगा  रहें है
समय से पूर्व ...
वाणी से चाकू छुरिया बोलते हैं
संवेदना मार कर
गाड़ दी है पाताल में...
और मानवता ...
किसी कोने में पत्थर हो  बैठी है मानवता
फिर से जी उठने को
अहिल्या कि तरह
राम के इंतज़ार में ...



Monday, April 7, 2014

बंटवारा

वो वक्त भी खुद से हारा था
उस दिन बंटवारा था ...

जलती आग का उठता हुआ धुंआ था
राम की खाला, रहीम की माँ का कत्ल हुआ था...

सरसों के खेतों में लाशों की फसल उगी थी
ईमान की गर्दन हैवान के आगे झुकी थी ...

बांट डाले घर-बार
गम-त्यौहार
बन्द कर डाले वो द्वार,
जिनपर  आने जाने की कहानियां लिखी हुई थी ...

तो फिर
सांसे लेना बँद क्यूं न किया मजहब बांटने वालों ने
हवा तो हिन्दु-मुसलमान ना हुई थी ।